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सोमवार, 5 मई 2008

ढाई आखर

मेरे प्यारे दोस्तो ,
ठीक एक महीने के बाद मैं फ़िर आपकी महफ़िल में आ गया हूँ । प्रेम के ढाई आखर और ढेरों शुभ - कामनाओं के साथ। एक शेर आपके विचार के लिए पेश है । कृपया दिल खोल कर अपनी टिप्पणीभेजें । :-
"दिल है तो उसी का है , जिगर है तो उसी का है ,
अपने को राह -ऐ -इश्क में बर्बाद जो कर दे । "
बस उसी का दिल -दिल है , जिगर , जिगर है ----प्रेम की राह पर जो अपनें को पूरा का पूरा मिटानें को तैयार है । पर ये "राह -ऐ -इश्क " हासिल उन खुस -नसीबों को ही होती है जिन्होनें अपने को मिटानें की कला सीख ली है। यह म्रत्यु की कला है , अपनें को डुबानें की कला है , अपनें को खोने की कला है । और यदि दम तोड़ती हुई मनुष्यता को बचाना है , जिंदा रखना है तो इस कला की साधना में मनुष्य को देर सवेर उतरना ही पड़ेगा ।
हार्दिक शुभ -कामनाओं एवं आत्मिक प्रेम सहित - तुम्हारा शुभेच्छु ---सत्येन्द्र मिश्रा

शनिवार, 8 मार्च 2008

जो मागोगे वही मिलेगा

जो इच्छा करिहौ मन माहीं , राम कृपा कछु दुर्लभ नाही
सामान्य रूप से यह देखनें में आता है कि हमारी इच्छाएं विरोधी हैं । हम जो भी मांग करते है वे एक दूसरे को काट देतीं है । और मजेदार बात यह है कि यह अस्तित्व हमारी मांगें पूरी कर देता है लेकिन जो हम मांग रहे है उसका हमे भी पता नहीं है । हमने कल जो मागा था - आज उससे इंकार कर देते हैं । आज अभी जो हमारी सबसे तीव्र अकंछा है वह साँझ होते- होते बदल जाती है । इस तरह हम कितनी ही इच्छाएँ इस विराट अस्तित्व रूपी के आगे रख चुके हैं - कि अगर वह सब पूरी करे , तो आप पागल होने से बच नहीं सकते । कोई उपाय नहीं जो आपको पागल होनें से बचा सके।
और उसने हमारी सब मांगें पूरी कर दीं हैं ।
जिन्होनें धर्म को गहरे में जाकर अनुभव किया है, वे जानते हैं कि आदमी की जो भी मांगें हैं , वे सब पूरी हो जाती हैं । यही आदमी की मुसीबत है। ---------क्रमश :

रविवार, 24 फ़रवरी 2008

सत्य का निजी अनुभव है :- तत्व ज्ञान

तत्व ज्ञान का अर्थ शास्त्रीय ज्ञान नहीं है । उधार ज्ञान नहीं है. आप ‘गीता’ रट लें इससे कुछ ज्ञान नहीं होगा आप 'धम्म पद याद कर लें , 'कुरान की आयतें कंठस्थ कर लें , इससे कुछ नहीं होगा । यह उधार है और ध्यान रहे , उधार का ज्ञान होता ही नहीं , सिर्फ़ आप शब्द इकट्ठे कर लेते हैं और ये शब्द स्मृति मैं बैठ जाते हैं ।
स्मृति ज्ञान नहीं है । ज्ञान का अर्थ है अनुभव । कृष्ण कहते हैं , ज्ञानिओं, ज्ञानवानों , का तत्व ज्ञान मैं ही हूँ , अनुभव मैं ही हूँ। अर्थात उस निजी अनुभव मैं जो जाना जाता है , वही परमात्मा है ।
परमात्मा के सम्बन्ध मैं जानना परमात्मा नहीं है। टू नो अबाउट गोड इस नाट टू नो गोड। यानि कि पमात्मा की बाबत जानना झूठा ज्ञान है - मिथ्या जानकारियों का संग्रह है और परमात्मा को जानना ही तत्व -ज्ञान है ।

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