गुरुवार, 23 अगस्त 2012

सेकुलर का अर्थ

सेकुलर का अर्थ हमारे नायकों नें अपनी सुबिधा के अनुसार परिभाषित किया है । जहाँ तक मेने समझा इसका अर्थ कर्तव्य -धर्म निरपेक्षता / राज -धर्म निरपेक्षता /लक्ष्य-धर्म निरपेक्षता के रूप में हमारे तथा कथित जन नायक लेते हैं । गांधीजी ने इन तीनों धर्मों को निभाया । इसीलिए गांधीजी को धर्म निरपेक्षता का झंडावरदार प्रचारित करना सर्वथा अनुचित है .गांधीजी सच्चे अर्थों में एक पूर्ण धार्मिक विभूति थे।...

रविवार, 8 जून 2008

शेर - ओ - शायरी

अक्ल कहती है न जा कूचा -ऐ -कातिल की तरफ़ ।सरफरोशी की हवश कहती है , चल क्या होगा । ।बड़े शौक व तवज्जो से सुना दिल के धड़कनें को ।में यह समझा कि शायद आपनें आवाज़ दी होगी । । होगी । ।नियाजे -इश्क की ऐसी भी एक मंजिल है ।जहाँ है शुक्र शिकायत किसी को क्या मालूम ।...

मंगलवार, 6 मई 2008

एक कहानी किश्तों में (गतांक से आगे )

सुबह सौदागर की जब आँख खुली तो उसनें पाया कि उसका व्यक्तिगत सेवक काफी का प्याला लिए खड़ा था । उसके चेहरे पर बड़ी मोहक मुस्कान थी , आंखों में असीम कृतज्ञता और मुद्रा में अलौकिक श्रद्धा का भाव । सौदागर कि समझ में कुछ नहीं आया । सेवक कॉफी रख कर चला गया । वह उठा और तरोताज़ा होकर कॉफी के घूँट भरने लगा । अचानक रात के तूफानी दृश्य उसके जेहन के दृश्य पटल पर चल चित्र की भांति चलनें लगे यकायक सेवक की मुद्रा का राज़ उसकी समझ में आ गया । एकबारगी कॉफी के घूँट की कड़वाहट बढ़ गई , उसने मुंह में भरी कॉफी उगालदान में जाकर उगल दी । वह कॉफी छोड़ कर बाहर आया । उसने एक नाविक को आवाज़ दे कर अपने पास बुलाया । कल का अक्खड़ नाविक उसकी आवाज़ सुन कर मक्खन की तरह पिघल गया । बड़े अदब से बोला ," मालिक हुक्म बजा लाता हूँ ।"...

धरती पर नरक कहाँ से आया

जय श्री गुरुवे नमःसोचो जिसने तुम्हें सुंदर सृष्टि दी , जो किसी भी प्रकार से स्वर्ग से कम नहीं है , आश्चर्य ! वहां नर्क (Hell) भी है । क्यों ? नर्क हमारी कृतियों का प्रतिफलन है । हमारी स्वार्थ भरी क्रियाओं मैं नर्क को जन्म दिया है । हमने अवांछित कार्यों के द्वारा अपने लिए अभिशाप की स्थिति उत्पन्न की है । स्पष्ट है कि नर्क जब हमारी उपज है , तोइसे मिटाना भी हमें ही पड़ेगा । सुनो कलियुग में पाप की मात्रा पुण्य से अधिक है जबकि अन्य युगों में पाप तो था किंतु सत्य इतना व्यापक था कि पापी भी उत्तमतरंगों को आत्मसात करने की स्थिति में थे । अतः नर्क कलियुग के पहले केवल विचार रूप में था , बीज रूप में था । कलियुग में यह वैचारिक नर्क के बीजों को अनुकूल और आदर्श परिस्थितियां आज के मानव में प्रदान कीं। शनै : शनैः जैसे - जैसे पाप का बोल-बालहोता गया ,नर्क का क्षेत्र विस्तारित होता गया । देखो । आज धरती पर क्या...

सोमवार, 5 मई 2008

ढाई आखर

मेरे प्यारे दोस्तो , ठीक एक महीने के बाद मैं फ़िर आपकी महफ़िल में आ गया हूँ । प्रेम के ढाई आखर और ढेरों शुभ - कामनाओं के साथ। एक शेर आपके विचार के लिए पेश है । कृपया दिल खोल कर अपनी टिप्पणीभेजें । :- "दिल है तो उसी का है , जिगर है तो उसी का है , अपने को राह -ऐ -इश्क में बर्बाद जो कर दे । " बस उसी का दिल -दिल है , जिगर , जिगर है ----प्रेम की राह पर जो अपनें को पूरा का पूरा मिटानें को तैयार है । पर ये "राह -ऐ -इश्क " हासिल उन खुस -नसीबों को ही होती है जिन्होनें अपने को मिटानें की कला सीख ली है। यह म्रत्यु की कला है , अपनें को डुबानें की कला है , अपनें को खोने की कला है । और यदि दम तोड़ती हुई मनुष्यता को बचाना है , जिंदा रखना है तो...

क्स्क्स्क्स

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जय श्री कृष्ण अच्युताष्ट्कम जय श्री कृष्ण अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्ण दमोदरम वासुदेवं हरिम । श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचंद्रम भजे । । अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकराधितम । इंदिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनन्दनं नन्दजम संदधे । ।अच्युतं केशवं ...

सोमवार, 7 अप्रैल 2008

स्तुति मंत्र

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरन्ये त्रयम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते ।।...

रविवार, 6 अप्रैल 2008

श्री दुर्गा बत्तीस नाम माला

एक समय की बात है , ब्रह्मा आदि देवताओं की प्रार्थना से प्रसन्न होकर दयामई दुर्गा मां ने कहा - "देवगण! सुनो - यह रहस्य अत्यन्त गोपनीय व दुर्लभ है । मेरी बत्तीस नामों की माला सब प्रकार की आपत्ति का विनाश करने वाली है । तीनों लोकों में इसके समान कोई स्तुति नहीं है - दुर्गा दुर्गार्तिशमनी दुर्गापद्विनिवारिणी । दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी । । दुर्गतोद्धारिणी दुर्गनिहन्त्री दुर्गमापहा । दुर्गमज्ञानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला । । दुर्गमा ...

शनिवार, 5 अप्रैल 2008

बधाई संदेश

नमस्ते , नमस्कार ,शुभ प्रभात आप सभी मित्रों को स्वामी तरुण मिश्रा की ओरसे नव संवत २०६५ ,दुर्गा पूजा और झूलेलाल जयंती की हार्दिक शुभ कामनाएं .............................उर में उत्साह रहे हर पल , विकसित हों तीनों तन ,मन ,धन , स्वर्णिम प्रभात लेकर आये , जो वर्ष आ रहा है नूतन । पुष्पित हो और पल्लवित हो , आप का सघन जीवन उपवन ,सस्नेह बन्धु स्वीकार करो स्नेहिल उर का अभिनन्दन...

एक कहानी सुनों किश्तों में

पुराने समय की बात है । एक सौदागर , दूर देश से अपने शहर को लौट रहा था । महीनों की समुद्री यात्रा करने के बाद , अब उसके अपने शहर की दूरी केवल एक रात की शेष रह गई थी । समुद्री सफर से बेहाल वह सौदागर जहाज के डेक पर खड़ा हुआ बड़ी बेसब्री से अपने शहर की दिशा में देख रहा था । जहाज के गोदाम में , उसका करोड़ो रुपए का माल सुरक्षित रखा हुआ था , जिसे दो दिन बाद शहर के बाजारों में बेचकर लाखों रुपए का मुनाफा कमाने के हसीन सपनें उसकी आंखों में तैर रहे थे । एक महीनें की छुट्टी लेकर अपने शानदार महल में , शाही आराम गाह में चेन की बंशी बजाने के ख्वाब , अपनी परी चेहरा बीवी के रेशमी पहलू में मुंह छुपाकर , महीनों की थकान से छुटकारा पाने की कल्पना । और न जानें क्या - क्या उसके जेहन में उमड़ - घुमड़ रहा था । रात गहराती जा रही थी , समुद्री हवा के नमकीन झोंके न जानें कब आंधी के थपेड़ों में बदल गए , उसे ख्याल ही नहीं...

गुरुवार, 3 अप्रैल 2008

एक जबाव चाहिए

मैकदों के भी आस -पास रही , गुल रुखों से भी रूसनास रही । जाने क्या बात है किइस पर भी , जिंदगी उम्र भर उदास रही ? मधुशालायें पास थीं , दूर नहीं । सुंदर मुखडों वाले लोग निकट थे, परिचय था उनसे ।---------------------- "मैकदों के भी आस पास रही" , शराब भी पी , विस्मरण भी किया , मधुशाला पास ही थी । गुलरुखों से भी रूसनास रही फूल जैसे सुंदर चेहरे वाले व्यक्तित्वों से भी परिचय रहा । मुलाकात रही । मधुशाला में भी विस्मरण किया ; प्रेम में भी डूबे - लेकिन फिर भी कुछ बात ............ "जाने क्या बात है कि इस पर भी, जिन्दगी उम्र भर उदास रही?" एक सवाल छोड़ रहा हूँ - एक ऐसा सवाल जिसका जवाब अगर मिल जाए ।तो इस् जगत के सारे सारे सवाल भी मिट जायें । केवल एक जवाब चाहिए जो उम्र भर कि उदासी मिटा दे...

सोमवार, 31 मार्च 2008

मुशायरा

एक मुशायरे में जाने का मौका मिला, कुछ शेर ह्रदय को छू गए । आपको भी अच्छे लगेंगे ऐसा मेरा विश्वाश है:- " वह शख्स सूरमा है , मगर बाप भी तो है , रोटी खरीद लाया है , तलवार बेचकर ॥ दूसरा है :- कितने मजबूर हैं इस दौर के बूढे मां-बाप , अपने बच्चों को नसीहत भी नही कर सकते ॥ तीसरा है:- वो क्या नदीम कोई इंकलाब लाएगा , जो हर कदम पर सहारे की तलाश करता है...

शनिवार, 29 मार्च 2008

जो मागोगे वाही मिलेगा... ३ (गतांक से आगे )

"एक राजा , एक हजार रानियाँ " प्रिय मित्रो , मेने सुना है , एक सम्राट युद्ध जीत कर घर वापस लौट रहा था । उसकी एक हजार रानियाँ थीं , उसने ख़बर भेजी कि में तुम्हारे लिए क्या लेकर आऊं । किसी ने कहा , हीरों का हार ले आना । किसी ने कहा , उस देश में कस्तूरी - मृग की गंध मिलती है , वह ले आना । किसी ने कहा , वहां के रेशम का कोई जबाव नहीं , तो रेशम की रंग - बिरंगी सारियां ले आना । ऐसे सभी रानियों ने अपनी अपनी अक्ल के हिसाब से जितना कुछ मांग सकतीं थीं वह - वह माँगा । एक रानी ने कहा , कि तुम घर आ जाओ , तुम बहुत हो । उस दिन तक उसने इस रानी पर कोई ध्यान ही नहीं दिया था । हजार रानियों में एक थी , कहीं पड़ी थी रनवास के किसी...

शुक्रवार, 21 मार्च 2008

शुभ होली

कुछ श्रद्धा , कुछ दुष्टता ,कुछ संशय ,कुछ ज्ञान । घर का रहा न घाट का , ज्यों धोबी का स्वान अज्ञान का अर्थ ज्ञान का अभाव नही है- जैसी कि अज्ञान की हम आम राय में शाब्दिक परिभाषा करते है अधूरे ज्ञान को पूर्ण ज्ञान मान लेना ही अज्ञान है । मेरे प्रिय मित्रो ,शुभ चिन्तको , मेरे नौजवान साथियों मेरे बुजुर्ग मित्रो , थोड़ी दृष्टि विस्तार करो तो तुम्हें भी यह साफ साफ दिखने लगेगा किआज भारत ही नही सम्पूर्ण विश्व कि मनुष्यता कमोवेश इस प्रकार के अज्ञान से ग्रस्त है । परिणाम सामने हैहमने जो कुछ पाया उसकी हजारों गुनी कीमत चुकाई है। विकास के लिए हमने प्रकृति को विनष्ट किया , प्रति स्पर्धा में हमने प्रेम गवा दिया । बुद्धि के बदले ह्रदय और स्वहित के बदले हमने सुब कुछ खो डाला । आज प्रेम एवं समर्पण के पावन त्यौहार "होली " का...

गुरुवार, 20 मार्च 2008

जो मांगोगे वही मिलेगा ...२ (गतांक से आगे )

कल्प वृक्ष की परिकल्पना हमने कल्पना की की स्वर्ग में कल्प वृक्ष होंगे , उनके नीचे आदमी बैठेगा । इच्छा करेगा , करते ही इच्छा पूरी हो जायेगी । लेकिन अगर आपको कल्प वृक्ष मिल जाये , तो बहुत सम्हलकर उसके नीचे बैठना । क्योंकि आपकी इच्छाओं का कोई भरोसा नहीं है । मैंने एक कहानी सुनी है । एक दफा एक आदमी - हमारे -आपके ही जैसा एक आदमी -भूल से कल्प वृक्ष के नीचे पंहुच गया । उसको पता भी नहीं था कि यह कल्प वृक्ष है । उसके नीचे बैठते ही उसको लगा कि बहुत भूख लगी है : अगर कहीं भोजन मिल जाता तो .... । वह एक दम चौंका , एक दम भोजन की थालियाँ चारो तरफ आ गईं । वह थोड़ा डरा भी कि यह क्या मामला है , कोई भूत प्रेत तो नही है यहाँ ! कहीं यहाँ कोई भूत प्रेत न हो ! उसके ऐसा सोचते ही - भोजन की थालियाँ गायब हो गईं , भूत प्रेत चारों ओर खडे हो गए । वह घबराया ! यह तो बडा उपद्रव...

शनिवार, 8 मार्च 2008

जो मागोगे वही मिलेगा

जो इच्छा करिहौ मन माहीं , राम कृपा कछु दुर्लभ नाहीसामान्य रूप से यह देखनें में आता है कि हमारी इच्छाएं विरोधी हैं । हम जो भी मांग करते है वे एक दूसरे को काट देतीं है । और मजेदार बात यह है कि यह अस्तित्व हमारी मांगें पूरी कर देता है लेकिन जो हम मांग रहे है उसका हमे भी पता नहीं है । हमने कल जो मागा था - आज उससे इंकार कर देते हैं । आज अभी जो हमारी सबसे तीव्र अकंछा है वह साँझ होते- होते बदल जाती है । इस तरह हम कितनी ही इच्छाएँ इस विराट अस्तित्व रूपी के आगे रख चुके हैं - कि अगर वह सब पूरी करे , तो आप पागल होने से बच नहीं सकते । कोई उपाय नहीं जो आपको पागल होनें से बचा सके। और उसने हमारी सब मांगें पूरी कर दीं हैं । जिन्होनें धर्म को गहरे में जाकर अनुभव किया है, वे जानते हैं कि आदमी की जो भी मांगें हैं , वे सब पूरी हो जाती हैं । यही आदमी की मुसीबत है। ---------क्रमश...

रविवार, 2 मार्च 2008

समाधान : स्वामी सत्येन्द्र माधुर्य

अपनी मानसिक एवं अध्यात्मिक समस्याओं के समाधान स्वामी सत्येन्द्र माधुर्य से प्राप्त करनें हेतु क्लिक करें http://www.tatwagyanindia.blogspot....

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008

TATWA GYAN INDIA: सत्य का निजी अनुभव है :- तत्व ज्ञान

TATWA GYAN INDIA: सत्य का निजी अनुभव है :- तत्व ज्...

रविवार, 24 फ़रवरी 2008

सत्य का निजी अनुभव है :- तत्व ज्ञान

तत्व ज्ञान का अर्थ शास्त्रीय ज्ञान नहीं है । उधार ज्ञान नहीं है. आप ‘गीता’ रट लें इससे कुछ ज्ञान नहीं होगा आप 'धम्म पद याद कर लें , 'कुरान की आयतें कंठस्थ कर लें , इससे कुछ नहीं होगा । यह उधार है और ध्यान रहे , उधार का ज्ञान होता ही नहीं , सिर्फ़ आप शब्द इकट्ठे कर लेते हैं और ये शब्द स्मृति मैं बैठ जाते हैं ।स्मृति ज्ञान नहीं है । ज्ञान का अर्थ है अनुभव । कृष्ण कहते हैं , ज्ञानिओं, ज्ञानवानों , का तत्व ज्ञान मैं ही हूँ , अनुभव मैं ही हूँ। अर्थात उस निजी अनुभव मैं जो जाना जाता है , वही परमात्मा है ।परमात्मा के सम्बन्ध मैं जानना परमात्मा नहीं है। टू नो अबाउट गोड इस नाट टू नो गोड। यानि कि पमात्मा की बाबत जानना झूठा ज्ञान है - मिथ्या जानकारियों का संग्रह है और परमात्मा को जानना ही तत्व -ज्ञान है...

Do you want to getting top........Courtesy Towards All

We show courtesy willingly and automaticlly to strangers but very little courtesy to people with whom we have to work day in and day out . we often interrupt the comversation of people who work for us. We interrupt them or half-listen to them . We often forget their names. We sometimes treat the people who work for us like furniture, but people appreciate courtesy from the boss, and they are quick to notice the lack of it t...

शनिवार, 23 फ़रवरी 2008

अध्यात्मिक शायरी

उम्र भर रेंगते रहने से कहीं बेहतर है , एक लम्हा जों तेरी रूह मैं बुसअत( विशालता) भर दे । यूं अचानक तेरी आवाज़ कहीं से आई जैसे परबत का जिगर चीर के झरना फू...

संकल्प

मैं परिश्रम पूर्वक उपार्जन करूँगा , मर्यादा पूर्वक भोग करूँगा और उदारता पूर्वक वितरण करूँगा । .................. स्वामी सत्येन्द्र माधुर्य...

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